Abhijeet Chaudhary
This is a official site of Poet Abhijeet Chaudhary known as Abhijeet Anand. In this site there is alots of poems that has been written by Abhijeet chaudhary. Thank you.
बुधवार, 13 मई 2020
आज कलमले
मंगलवार, 12 मई 2020
काश तिम्रो समानता
बुधवार, 20 जून 2018
ज़िन्दगी
बुधवार, 14 फ़रवरी 2018
नारी
करब मान सम्मान नारी के
कैह-कैह करै छि पाप
जाहि कोख सँ जनम लेलौं
बनेलौं ताहि के श्राप......
करै छि नारी के सम्मान.........
करै छि नारी के..........
झूठा वादा झूठा इरादा
फसेलौं कही-कही क नयाँ रीत
भावना के नरम गाथा गा कs
बनलौं आँहा पतित
कहै छि,
करै छि नारी के सम्मान
करै छि नारी के.........
वाह रे दुनियाँ ढोंगी पाखण्डी
देखलियौ तोरो कहानी
रामायण आ महाभारत के सुनलियौ
तोरो कहानी...
नारी के तू सम्मान करै छें
विवाह कs छोड़बै छे घर परिवार
चाहि उल्टे सोना टिकिया
चाही पलंग केवार
करै छे नारी के सम्मान..
करै छे नारी के........
【बाँकी भाग दोशर दिन】
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© कुमार अभिजीत आनंद......
बुधवार, 7 फ़रवरी 2018
मुझे पता है एक दिन...
क्या होता है दुत्कारना
जब बितेगा तुम पर
आशा है , तुम भी संभल जाओगे....
कहते हैं लोग चाँद इतना खूबसूरत क्यों है ?
इतना खूबसूरत होने के बाद भी
उसमे दाग़ क्यों है...?
मुझे नही पता ये सब
में तो बस् इतना जानता हूँ की
चाँद में दाग़ है फिर भी
लोग उसी को चाहते हैं
उसीको झुक के शज़दा करते हैं
उशी से प्यार करते हैं....
तुम्हारी ये दुत्कार को भि क़द्र किया है मैंने
इतना कुछ होंने के वावजूद भी शब्र किया है मैंने
अब मुझे नही पता कि ये सब क्यों कर रहा हूँ
किस लिए कर रहा हूँ
ज़िंदा लाश हुँ , क्यों हूँ नहीँ पता
पर इतना ज़रूर जनता हूँ ...
खुद को ईश ज़मीं पर किशि के लिये...
कब्र किया है मैने.....…
©कुमार अभिजीत आनंद
आज़ फिर से....
मेरे मनको बेचैन बना गई वो
सामने थी, साथ बैठी थी
बातें कि...मुस्कुराये हम
जब स्पर्श करना चाहा
फिर वही हुवा जो होता आया है...
आखिर क्यों ?
क्यों तुम मेरे साथ ही ऐसा करती हो
शांत मनमे बेचैनी और चञ्चलता बढ़ाती हो
आखिर क्यों ?
में कुछ नही जानता
जो लोग सोचते है,
वो में कुछ नही मानता....
फिर क्यों ?
क्या मेरा क्यों का जवाब क्यों में ही रहेगा
या जिस् वज़ूद को में ढूंढ़ रहा हु
वो तुम ही हो.......
लेखक,
©कुमार अभिजीत आनंद
रविवार, 4 फ़रवरी 2018
प्रभु ! आपको लगता होगा..
प्रभु!
आपको लगता होगा
में कविता में क्या लिखता रहता हूँ
क्या कहूँ.....…
हर वक़्त आपको...बस् आपको
पैगाम लिखता रहता हूँ....
आप सोचते होंगे तुम पागल तो नहीँ ?
हाँ प्रभु !
में पागल हि तो हूँ,
दुनियाँ का ठोकर खाया हुवा घायल हि तो हूँ.....
आपको पाने के लिए हि
में ये सब बोलता रहता हूँ
आपको रिझाने के लिए हि
में आपको कोशता रहता हूँ.......
लेखक,
कुमार अभिजीत आनंद
©अभिजीत चौधरी
क्या तू सच मे हे
क्या तू सचमें है
तेरा वज़ूद भी है या बस्
एक बहम है..अंधविस्वास है इंसानों का......
अभितक बस् सुनते ही आया हूँ
की तुहि सबकुछ है,
बस् तुहि है और कोई नहीँ।
तो आना..? आता क्यों नहीँ ?
मुझ पापिको ले जाना...आ..लेजा ?
तंग आ गया हूँ
इस ज़िन्दगी से
तंग आ गया हूँ
इस बेखुदी से....
नहीँ रहना है तुम्हारे
इस वनावटी दुनियाँ में
नहीँ ज़िना है मुझे
इस दिखावटी दुनियाँ में।
बस् अब और नहीँ.......
अगर तू सच में है,
तो आकर ले ज़ा...
मेरा वज़ूद ..,मेरा अस्तित्व मिटाकर ले ज़ा
में तेरा कर्ज़दार रहूँगा.....
में तेरा शुक्रगुज़ार रहूँगा.....
लेखक,
अभिजीत आनंद
©अभिजीत चौधरी
खाव्हीशें तो बहौत है ...
मन तो बहौत है कुछ कऱने कि
लेकिन कभी-कभी टूट सा जाता हूँ
बिखर सा जाता हूँ.....
रास्ते तो बहौत हे मंज़िल पर जाने कि
लेकिन ये जो वक़्त है
मुझे जीने नहीँ दे रहा
चाहता हुँ बहोत कुछ करने कि
लेकिन कुछ करने नहीँ दे रहा....
ऐ खुदा !
तुझे क्या कहूँ
अल्लाह कहूँ या भगवान
हिन्द कहूँ या इश्लाम.....
तूम जो भी हो, जहाँ भी हो...
एक हो में जानता हूँ
तेरे अस्तित्व और प्रभूताको में मानता हूँ
लेकिन तुम्हारे बनाये हुवे इन लोगों को तो देखो
में कुछ करना चाहता हूँ
करने नहीँ दे रहा
में ज़िना चाहता हूँ.......
ज़ीने नहीं दे रहा.......
लेखक,
कुमार अभिजीत आनंद

हे प्रभु !
हे प्रभु !
क्षमा कs दिय,
अगर हमरा सँ कोनो ग़लती भेल ह्यात त
अगर हमरा स कोनो भूल भेल ह्यात त
हम कोनो लेखक नै छि
हम कोनो शायर नै छि
बस् बून्द शब्द के अबैय जे मनमेँ
लिख़ लिख कs समझबै छि
हम कोनो कवि या कलाकार नै छि।
आहाँ अपन अनुकंपा कहु
या ओकर वियोग
आहाँ हमरा पागल कहु
या समयक संयोग
आहाँ जे कहु, जे समझू
आहाँ के सम्झके अधिकार अछि।
हम लिखै छि कि, सोचै छि कि ??
कि करै छि मालूम नै रहैय,
इ वियोग पीड़ा बस् अंतिम क्षण अछि
इ मनक जवाब कहैय..............
हे प्रभु !
लेखक,
©अभिजीत चौधरी
अभिजीत आनंद
गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018
..............विडम्बना................
मनक बात मनमे रहि गेल
नै बनल नाता,नै बनल रिस्ता
खेल ई केहन खेल जे खेललौं
टूटि क...छुटि गेल
वस....सँ पहिने ओ नाता
विडम्बना छल केहन..............
आहाँ सँग प्रीत लगाव के
मनक बात कहि
आहाँ सँग मीत लगाव के
विरह, वियोग के संगम द
ई दुनियाँ के झुठा रीत निभेलौं
विडम्बना छल केहन.........
ई संसार डेराइय,
अहिक अश्तित्व सँ,
ई संसार रचाइय,
दोष कि छल हम तुक्ष के
देलौं किया विरह भेंट अपार
विडम्बना छल केहन............
अहाँक याद के ओ पल्
सरगम बनि थिरकई छि
सोइच क वितल कल
हम ने बुझलौं, हम ने जनलौं
नै समझलौं प्रेमक ओ गाथा
विडम्बना छल केहन........
©अभिजीत चौधरी
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
कुछ शब्द
बुधवार, 24 जनवरी 2018
तलाश !
तलाश जारी अछि मंज़िलक पाव के
इंतज़ार जारी अछि ओ रस्ता आजमाव के
नै मिलल त कि करू
इ त भाग-भाग के बात अछि
हम कोशिशो नै करू
इ त गलत बात अछि।
अतेक आशॉन कहाँ अछि,
मंज़िलक ओ संगम के
अतेक पानी कहाँ अछि
प्याश बुझा दै जे मनके......
अपन अंतकरण के समझा कs राखी,
अपन प्याशक मनके बुझा कs राखी
अतेक आशॉन मंज़िलक लक्ष्य नै अछि
अपन मनक चञ्चलता के मना कs राखी।
हे प्रभु!
ई मिथ्यामई संसारक....,
ई भोग विलाशक दुनियाँ सँ दूर,
हमरा भगा दिय
अहाँ अपन प्रभुत्व सँ मिला दिय
बस् एक विनती, एक गुज़ारिश अछि अहाँ स
पलभर के लेल अहाँ अपन अस्तित्व सँ मिला दिय......
हम आहाँक कर्ज़दार रहब.....
हम आहाँक शुक्रगुज़ार रहब.......
लेखक,
अभिजीत चौधरी
"Abhijeet Anand"
©सर्वाधिकार सुरक्षित
