आज फिर से याद आइ वो
मेरे मनको बेचैन बना गई वो
सामने थी, साथ बैठी थी
बातें कि...मुस्कुराये हम
जब स्पर्श करना चाहा
फिर वही हुवा जो होता आया है...
आखिर क्यों ?
क्यों तुम मेरे साथ ही ऐसा करती हो
शांत मनमे बेचैनी और चञ्चलता बढ़ाती हो
आखिर क्यों ?
में कुछ नही जानता
जो लोग सोचते है,
वो में कुछ नही मानता....
फिर क्यों ?
क्या मेरा क्यों का जवाब क्यों में ही रहेगा
या जिस् वज़ूद को में ढूंढ़ रहा हु
वो तुम ही हो.......
मेरे मनको बेचैन बना गई वो
सामने थी, साथ बैठी थी
बातें कि...मुस्कुराये हम
जब स्पर्श करना चाहा
फिर वही हुवा जो होता आया है...
आखिर क्यों ?
क्यों तुम मेरे साथ ही ऐसा करती हो
शांत मनमे बेचैनी और चञ्चलता बढ़ाती हो
आखिर क्यों ?
में कुछ नही जानता
जो लोग सोचते है,
वो में कुछ नही मानता....
फिर क्यों ?
क्या मेरा क्यों का जवाब क्यों में ही रहेगा
या जिस् वज़ूद को में ढूंढ़ रहा हु
वो तुम ही हो.......
गध् कविता संग्रह
लेखक,
©कुमार अभिजीत आनंद
लेखक,
©कुमार अभिजीत आनंद
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