रविवार, 4 फ़रवरी 2018

खाव्हीशें तो बहौत है ...

खाव्हीशें तो बहौत है जीने कि
मन तो बहौत है कुछ कऱने कि
लेकिन कभी-कभी टूट सा जाता हूँ
बिखर सा जाता हूँ.....
रास्ते तो बहौत हे मंज़िल पर जाने कि
लेकिन ये जो वक़्त है
मुझे जीने नहीँ दे रहा
चाहता हुँ बहोत कुछ करने कि
लेकिन कुछ करने नहीँ दे रहा....
ऐ खुदा !
तुझे क्या कहूँ
अल्लाह कहूँ या भगवान
हिन्द कहूँ या इश्लाम.....
तूम जो भी हो, जहाँ भी हो...
एक हो में जानता हूँ
तेरे अस्तित्व और प्रभूताको में मानता हूँ
लेकिन तुम्हारे बनाये हुवे इन लोगों को तो देखो
में कुछ करना चाहता हूँ
करने नहीँ दे रहा
में ज़िना चाहता हूँ.......
ज़ीने नहीं दे रहा.......
                  
                          लेखक,
                 कुमार अभिजीत आनंद
                  ©अभिजीत चौधरी

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