क्या तू सचमें है
तेरा वज़ूद भी है या बस्
एक बहम है..अंधविस्वास है इंसानों का......
अभितक बस् सुनते ही आया हूँ
की तुहि सबकुछ है,
बस् तुहि है और कोई नहीँ।
तो आना..? आता क्यों नहीँ ?
मुझ पापिको ले जाना...आ..लेजा ?
तंग आ गया हूँ
इस ज़िन्दगी से
तंग आ गया हूँ
इस बेखुदी से....
नहीँ रहना है तुम्हारे
इस वनावटी दुनियाँ में
नहीँ ज़िना है मुझे
इस दिखावटी दुनियाँ में।
बस् अब और नहीँ.......
अगर तू सच में है,
तो आकर ले ज़ा...
मेरा वज़ूद ..,मेरा अस्तित्व मिटाकर ले ज़ा
में तेरा कर्ज़दार रहूँगा.....
में तेरा शुक्रगुज़ार रहूँगा.....
लेखक,
अभिजीत आनंद
©अभिजीत चौधरी
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