गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

..............विडम्बना................


विडम्बना छल केहन हमर ओ विधाता
मनक बात मनमे रहि गेल
नै बनल नाता,नै बनल रिस्ता
खेल ई केहन खेल जे खेललौं
टूटि क...छुटि गेल
वस....सँ पहिने ओ नाता
विडम्बना छल केहन..............
आकांक्षा बनल छल
आहाँ सँग प्रीत लगाव के
मनक बात कहि
आहाँ सँग मीत लगाव के
विरह, वियोग के संगम द
ई दुनियाँ के झुठा रीत निभेलौं
विडम्बना छल केहन.........
मानलौं अहाँक प्रभुत्व सँ
ई संसार डेराइय,
अहिक अश्तित्व सँ,
ई संसार रचाइय,
दोष कि छल हम तुक्ष के
देलौं किया विरह भेंट अपार
विडम्बना छल केहन............
गीत बनि गबै छि
अहाँक याद के ओ पल्
सरगम बनि थिरकई छि
सोइच क वितल कल
हम ने बुझलौं, हम ने जनलौं
नै समझलौं प्रेमक ओ गाथा
विडम्बना छल केहन........
लेखक
©अभिजीत चौधरी
(सर्वाधिकार सुरक्षित)

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